Tuesday, September 4, 2007

अभिमान सौन्दर्य का

गर्व मत कर पुष्प अपनी अधखिली सुकुमारता पर
गूँजते चाहक भ्रमर की कामना की विवशता पर
मत अकड़ इस वायु विस्तृत फैलते मकरन्द ही पर
तितलियों का दिल लुभाती देह के इस रंग ही पर

पवन तुझको गोद में लेकर झुलाती है सदा
सूर्य की किरणें अभी तुझको हँसाती हैं सदा
किन्तु इतना ध्यान रख तू ऐ सुकोमल पुष्पवर
रूप के अभिमान की तो कुछ दिनों की है उमर

अन्त की तो कल्पना कर जरा को ला ध्यान में
वृद्ध सा मृतप्राय सा जब तू पड़ा उध्यान में
जिस पवन की गोद में तू झूलता था प्रेम से
उसी के इक तीव्र झोंके से गिरा तू भूमि पे

श्वास अन्तिम ले रहा तू है पड़ा अब भूमि पर
साथ देने आज तेरा है नहीं आता भ्रमर
सूर्य की अब वही किरणें जो हँसाती थीं तुझे
आज तेरे वृद्ध तन को हैं जलाती तपन से

अन्त के इस दृश्य को ही याद करके पुष्पवर
रंग का अभिमान मत कर गर्व मत कर रूप पर

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